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Saturday, August 11, 2018

181-क़ुर्बानी की परिभाषा और उसका हुक्म

✍🏻मुजाहिदुल इस्लाम अज़ीमाबादी

क़ुर्बानी से अभिप्राय क्या है? और क्या यह वाजिब (अनिवार्य) है या सुन्नत है?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

क़ुर्बानी : ईदुल अज़्हा के दिनों में अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ला की निकटता प्राप्त करने के लिए बहीमतुल अनआम (चौपाये जानवरों यानी, ऊंट, गाय, भेड़ या बकरी) में से जो जानवर ज़ब्ह (वध) किया जाता है उसी को क़ुर्बानी कहते हैं।

यह इस्लाम के प्रतीकों में से है जो अल्लाह तआला की किताब, उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत और मुसलमानों के इज्माअ (सर्वसहमति) से धर्मसंगत है।

अल्लाह की किताब से प्रमाण :

1 – अल्लाह तआला का फरमान है :

(فَصَلِّ لِرَبِّكَ وَانْحَرْ)

‘‘तो तू अपने रब के लिए नमाज़ पढ़ और क़ुर्बानी कर।‘’ (सूरतुलकौसरः 2)

2 – अल्लाह तआला ने फरमाया :

{ قُلْ إِنَّ صَلاَتِى وَنُسُكِى وَمَحْيَاىَ وَمَمَاتِى للَّهِ رَبِّ الْعَـلَمِينَ * لاَ شَرِيكَ لَهُ وَبِذَلِكَ أُمِرْتُ وَأَنَاْ أَوَّلُ الْمُسْلِمِينَ}.

‘’आप कह दीजिए कि बेशक मेरी नमाज़ और मेरी सभी इबादतें और मेरा जीना और मेरा मरना सब सर्वसंसार के पालनहार अल्लाह के लिए है। उसका कोई शरीक (साझी) नहीं, मुझे इसी का हुक्म दिया गया है। और मैं सबसे पहला मुसलमान (आज्ञाकारी) हूँ।‘’ (सूरतुल अन्आम 162-163)

आयत में ‘नुसुक’ से अभिप्राय क़ुर्बानी है, यह सईद बिन जूबैर का कथन है। एक दूसरे कथन के अनुसार उससे अभिप्राय सभी इबादते हैं जिनमें क़ुर्बानी भी शामिल है, यह कथन अधिक व्यापक है।

3 – और अल्लाह तआला ने फरमाया :

[ وَلِكُلِّ أُمَّةٍ جَعَلْنَا مَنسَكًا لِّيَذْكُرُواْ اسْمَ اللَّهِ عَلَى مَا رَزَقَهُمْ مِّن بَهِيمَةِ الاَنْعَـامِ فَإِلَـهُكُمْ إِلَـهٌ وَاحِدٌ فَلَهُ أَسْلِمُواْ وَبَشِّرِ الْمُخْبِتِينَ ].

‘’और हर उम्मत (समुदाय) के लिए हम ने क़ुर्बानी का तरीक़ा निर्धारित किया है ताकि वे उन चौपाये जानवरों पर अल्लाह का नाम लें जो अल्लाह ने उन्हें प्रदान किए हैं। तुम सब का सच्चा पूज्य केवल एक ही है, तो तुम उसी के आज्ञाकारी बनकर रहो और विनम्रता अपनानेवालों को शुभ सूचना दे दीजिए।‘’ (सूरतुल हज्जः 34)

सुन्नत(हदीस) से प्रमाण :

1 - सहीह बुखारी (हदीस संख्याः 5558) और मुस्लिम (हदीस संख्याः 1966) में अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं : (नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दो सफेद व काले रंग के भेड़ों की क़ुर्बानी की, उन्हें अपने हाथ से ज़ब्ह किया और ‘बिस्मिल्लाह, अल्लाहु अक्बर’ कहा और अपना पैर उनकी गर्दन पर रखा। )

2 – अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा कहते हैं : (नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मदीना में दस वर्ष रहे और हर वर्ष क़ुर्बानी करते रहे।) इसे अहमद (हदीस संख्याः 4935) और तिर्मिज़ी (हदीस संख्याः 1507) ने रिवायत किया है और शैख अल्बानी ने ‘’मिश्कातुल मसाबीह’’ (हदीस संख्याः 1475) में इसे हसन क़रार दिया है।

3 – उक़्बा बिन आमिर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत हैं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने सहाबा के बीच क़ुर्बानी के जानवर वितरण किये तो उक़्बा के भाग में जज़आ (छह महीने का भेड़) आया, तो वह कहने लगे ऐ अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम), मेरे भाग में जज़आ आया है। आप ने फरमायाः तुम उसी की क़ुर्बानी करो।) इसे बुखारी (हदीस संख्या : 5547) ने रिवायत किया है।

4 – बरा बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत हैं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : ( जिस ने ईद की नमाज़ के बाद क़ुर्बानी किया तो उसकी क़ुर्बानी पूरी हो गई और उसने मुसलमानों की सुन्नत को पा लिया।) इसे बुखारी (हदीस संख्या : 5545) ने रिवायत किया है।

मालूम हुआ कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने स्वयं क़ुर्बानी की है, और आप के सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम ने भी क़ुर्बानी की है, और आप ने बतलाया कि क़ुर्बानी मुसलमानों की सुन्नत यानी उनका तरीक़ा है।

यही वजह है कि क़ुर्बानी के धर्मसंगत होने पर मुसलमान एकमत हैं। जैसा कि कई एक विद्वानो ने उल्लेख किया है।

जबकि इस मुद्दे में उलमा के बीच इख्तिलाफ है कि क्या क़ुर्बानी सुन्नते मुअक्कदा है या वाजिब (अनिवार्य) है कि जिसका छोड़ना जायज़ नहीं है?

जम्हूर उलमा इस तरफ गए हैं कि क़ुर्बानी करना सुन्नते मुअक्कदा है। यह इमाम शाफई का मत, तथा इमाम मालिक और इमाम अहमद का प्रसिद्ध मत है।

जबकि दूसरे उलमा इस तरफ गये हैं कि क़ुर्बानी करना वाजिब (अनिवार्य) है। यह इमाम अबू हनीफा का मत, और इमाम अहमद से दो रिवायतों मे से एक यही है। और शैखुल इस्लाम इब्ने तैमिय्या ने भी इसी मत को इख्तियार किया है। वह कहते हैं : यही इमाम मालिक के मत में दो कथनों में से एक है या इमाम मालिक का ज़ाहिरी मत यही है।‘’ इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह की पुस्तक ‘’अहकामुल उज़्हिया वज़्ज़कात’’ से समाप्त हुआ।

शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह कहते हैं : ‘’क़ुर्बानी का सामर्थ्य रखने वाले व्यक्ति पर क़ुर्बानी करना सुन्नते मुअक्कदा है। अतः मनुष्य को चाहिए कि वह स्वयं अपनी ओर से और अपने घर वालों की ओर से क़ुर्बानी करे।‘’ फतावा इब्ने उसैमीन (2/661)

176-क़ुर्बानी की क़ीमत के बराबर सदक़ा करने की तुलना में क़ुर्बानी करना अफ़ज़ल है।

✍🏻मुजाहिदुल इस्लाम अज़ीमाबादी

मैं और मेरा भाई दो अलग-अलग घरों में रहते हैं, ईद के अवसर पर हमारा इरादा है कि हम ऐक मेंढा ज़बह करें, और दूसरे को ज़बह किए बिना सदक़ा कर दें। तो क्या हमारे लिए दोनों मेंढों को ज़बह करना अनिर्वाय है या नहीं?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

आप दोनों के लिए शरई आदेश यह है कि आप दोनों दो जानवर की क़ुर्बानी करें। आप दोनों एक क़ुर्बानी में साझीदार नहीं हो सकते। क्योंकि आप ने उल्लेख किया है कि आप अपने भाई के साथ नहीं रहते, बल्कि दोनों भाई अलग-अलग रहते हैं। और हम प्रश्न संख्याः (174) के उत्तर में क़ुर्बानी के जानवर में साझीदार होने की शर्तों का उल्लेख कर चुके हैं, और हमने वहाँ पर कुर्बानी के हुक्म के बारे में विद्वानों के मतभेद का उल्लेख किया है, और यह कि विद्वानों की बहुमत के निकट कुर्बानी सुन्नते मुअक्कदा है, और कुछ धर्मशास्त्रियों के अनुसार कुर्बानी करना वाजिब है।

तथा विद्वानों ने उल्लेख किया है कि क़ुर्बानी की क़ीमत दान करने के बजाय क़ुर्बानी का जानवर ज़बह करना बेहतर है। इस आधार पर, आप यह कर सकते हैं कि क़ुर्बानी का जानवर ज़बह कर उसका गोश्त दान कर दें। या आप किसी दूसरे व्यक्ति को वकील नियुक्त कर दें जो किसी ऐसे देश या क्षेत्र में आपकी ओर से उसे ज़बह करे जहाँ लोगों को इसकी अधिक ज़रूरत होती है।

‘‘मतालिब ऊलिन्नुहा’’ (2/473) में उल्लेख हैः

‘‘(और उसे ज़बह करना) अर्थात क़ुर्बानी के जानवर को ज़बह करना, (और इसी तरह अक़ीक़ा करना : उसकी क़ीमत दान करने से बेहतर है), इमाम अहमद ने स्पष्ट रूप से इस बात का उल्लेख किया है। इसी तरह हदी (हज्ज में ज़बह किया जाने वाला क़ुर्बानी) का जानवर भी है ... नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके बाद खुल्फा-ए-राशेदीन ने (ईद के दिन) क़ुर्बानी की है और इसी तरह हदी के जानवर को (हज्ज के मौसम में मक्का) भेजा है; अगर (हदी और ईद की क़ुर्बानी के जानवर की) क़ीमत दान करना बेहतर होता तो वे उससे उपेक्षा न करते।’’ समाप्त हुआ।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

165- क़ुर्बानी के जानवर मे साझी होना

✍🏻मुजाहिदुल इस्लाम अज़ीमाबादी

क्या क़ुर्बानी के जानवर में साझी होना जाइज़ है, तथा क़ुर्बानी के जानवर में मुसलमानों की कितनी संख्या साझी हो सकती है ?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

क़ुर्बानी का जानवर अगर ऊँट या गाय में से है तो उस में साझेदारी जाइज़ है, किन्तु बकरी में साझा जाइज़ नहीं है।

एक गाय या ऊँट में सात लोग साझी हो सकते हैं।

सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम का हज्ज व उम्रा में हदी (हज्ज की क़ुर्बानी का जानवर) में एक ऊँट या एक गाय में सात लोगों का साझी होना प्रमाणित है।

इमाम मुस्लिम (हदीस संख्या : 1318) ने जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा : "हम ने हुदैबिय्या के साल अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ ऊँट की सात लोगों की तरफ से, तथा गाय की सात लोगों की तरफ से क़ुर्बानी की।"

और एक रिवायत में : जाबरि बिन अब्दुल्लाह से ही रिवायत है कि उन्हों ने कहा : हम ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ हज्ज किया तो ऊँट की सात लोगों की तरफ से और गाय की सात लोगों की तरफ से क़ुर्बानी की।"

तथा अबू दाऊद (हदीस संख्या : 2808) ने जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु से ही रिवायत किया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "गाय सात लोगों की तरफ से है, और ऊँट सात लोगों की तरफ से है।" इसे अल्बानी ने सहीह अबू दाऊद में सहीह कहा है।

इमाम नववी "शरह मुस्लिम" में फरमाते हैं :

"इन हदीसों में इस बात पर तर्क मौजूद है कि हदी (हज्ज की क़ुर्बानी के जानवर) में साझा जाइज़ है, तथा इस बात पर सब की सहमति है कि बकरी में साझा जाइज़ नहीं है। तथा इन हदीसों से ज्ञात हुआ कि ऊँट सात लोगों की तरफ से, तथा गाय भी सात लोगों की तरफ से काफी है, और उन में से हर एक सात बकरियों के बराबर है, यहाँ तक कि अगर मोहरिम पर शिकार के बदले के अलावा सात दम (क़ुर्बानी) अनिवार्य हो, और वह एक ऊँट या गाय की क़ुर्बानी कर दे तो यह सब की तरफ से काफी हो जायेगा।" (संछेप के साथ समाप्त हुआ।)

तथा इफ्ता की स्थायी समिति से क़ुर्बानी के जानवर में साझेदारी के बारे में प्रश्न किया गया, तो उस ने उत्तर दिया :

"ऊँट और गाय सात लोगों की तरफ से काफी है, चाहे वे लोग एक ही घर के सदस्य हों या विभिन्न घरों के हों, और चाहें उन के बीच कोई नातेदारी हो या न हो ; क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम को ऊँट और गाय में से हर एक में सात लोगों को साझी होने की अनुमति प्रदान की, और इस के विस्तार का उल्लेख नहीं किया।" (फतावा अल्लज्ना अद्दाईमा 11/401)

तथा शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह ने "अहकामुल उज़हिया"  में फरमाते हैं :

"एक बकरी एक आदमी की तरफ से काफी है, और ऊँट या गाय का सातवाँ भाग उस चीज़ की तरफ से काफी है जिस की तरफ से एक बकरी काफी होती है।" (इब्ने उसैमीन की बात समाप्त हुई।)

٢٣٥- کیا مرغ یا انڈے کی قربانی جائز ہے.؟

✍🏻مجاہدالاسلام عظیم آبادی سوال-مدعیان عمل بالحدیث کا ایک گروہ مرغ کی قربانی کو مشروع اورصحابہ کرام کا معمول بہ قرار دیتا ہے۔اور...